विचार एक पल के...

🤔 कुछ पल ऐसे आते हैं कि हम समझ के भी उस पल के नजाकत को नहीं समझ पाते। हमारा मन मस्तिष्क शून्य की ओर जाने लगता है, हालांकि यह मात्र एक भ्रम है क्योंकि जब हम यह विचार कर पा रहे हैं कि मन मस्तिष्क शून्य की ओर जा रहा है अर्थात् विचार की शक्ति क्षीण प्रतीत हो रही है, तो हम वहां शून्य नहीं हैं।               मन की अस्थिरता.......

🤔कभी कभी मन इस प्रकार विचलित होता है कि संभलना एक युद्ध स्तर का कार्य लगता है, जब संभलना भी अनिवार्य होता है।      विचलित मन .....


🤔एक ऐसी परिस्थिति आती है कि हम ही अपराधी और हम ही अधिवक्ता भी , शर्त यह होती है कि विधि निर्णायक का स्थान विधाता को ही समर्पित होता है।    प्रतिनिर्णायक स्थिति

📖संदर्भित ; किसी में आसक्त होना और उसी को इससे अनासक्त करना कितना अद्भुत परीक्षण है न अपना।


🛕क्या होता है जब आपको पता है कि सामने वाला आपसे छल करने वाल है, परंतु आप इसे कुछ कहना भी नहीं चाहेंगे। क्योंकि उसके आपके करीब होने के साथ ,आप एक विचारशील सामाजिक मानसिकता वाले हैं, तो आप वहां ठगे ही जायेंगे। हालांकि यह प्रक्रिया जब कई बार दोहराई जाने लगे तो आपको/हमें एक अलग कदम की ओर रुख कर लेना चाहिए अर्थात् उसे अपनी आन्तरिक स्थितियों से अवगत कराने का सप्रयाश करना ही चाहिए।         एक सम्बन्ध दुचिता(दुविधा)......

🫀क्या होगा जब आपको पता हो आपका परिवार आपके कारण सामान्य से निम्न की ओर होता हुआ दिखाई दे और आप एक प्रकार से विवश हों? आपको अपने से श्रेष्ठ पर( जैसे पिता) विश्वास बनाए रखना होगा। और अपने आप को प्रबल करने का अधिकाधिक प्रयास करना होगा।  एक परिवारिक धर्मसंकट स्थिति

✍️जब हम अपने करीबी को कुछ सीखा रहे हैं जिसके योग्य वह न हो अर्थात् उसका सदुपयोग वह कर ही न पाए तो वह इस ज्ञान का दुरुपयोग ही करेगा। इसकी आशंका भी हमें ज्ञात होती है तो एक न एक दिन वह दुरुपयोग हमसे हम पर ही स्पष्ट होगा। मेरे साथ तो घटित हुआ।
सुझाव: किसी को ज्ञान देना उत्तम कार्य है परन्तु बिना इसका सदुपयोग की दृष्टि से दिया गया ज्ञान निरर्थक होगा। 
यहां प्राचीन कहावत भी स्पष्ट होती है दूसरे के लिए गड्ढा अपने लिए भी हो सकता है।       प्रतिफल